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मेरे अल्फाज़

नवाचार

rajesh katre

11 कविताएं

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परंपराओं की परिपाटी से कर्तव्य निर्वहन में,
शक हरदम मुझेको है रहता।

अब नये दौर में परंपराओं को छोड़ कर,
मैं हर निर्णय स्वविवेक से हूँ लेता।

इसलिये जग प्रपंच के निंदा रस में,
मिठास स्वरुप मैं ही हूँ घुल जाता। 

क्योंकि इन मजबूरियों के भी समुंदर में,
मैं अफसोस को नहीं तैरते देख सकता।

मैं कर्तव्यों की दरिया में कर्मों की पतवार बनाकर,
स्वविवेक की नाव को हूं तैराता।

हां पावन पावस जल से इस सहज कर्मपथ पर,
अकसर आती है बाधा!! बाधा ऐसी
जैसे बनकर आए तूफान, बवंडर,
अंधड़ और चक्रवात ।

इनको तो बहला-फूसलाकर मना लेता हूं,
देकर अपने कर्मों की सौगात।
पर वे उद् गार मेरे दिल के जिनका,
कर्तव्यों की परिपाटी में हो जाता है प्रतिकार।

और कर्मों की बलिवेदी पर उनका
हो जाता है संहार।
तब चूर चूर बेजान दिल को भी मैं,
अपने मजबूत इरादों की जंजीरों से हूं कस देता ।
क्योंकि 'मंजिल' रुपी सुंदरी से ही
है मेरा मनमोहक नाता।

-  राजेश कुमार कटरे 


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