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Sarita

मेरे अल्फाज़

सरिता

Rajendra Singh

40 कविताएं

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अरे सरिता,
कहां थी इतने बरस
नहीं बहती आजकल इधर
कहां बहती हो, कहां रहती हो
क्या कहती हो, क्या सहती हो
कुछ तो बताती मुझको भी।

चलो आ गई तो
ज़रा लौटा दो न वो लम्हा
जिसमें मुझको बाँध लिया था
और वो तेरे नैनों का मोती भी
जिसने मुझको साध लिया था।

हाँ,
मेरी पहली कविता की पहली श्रोता
ज़रा वो श्रवण भी लेते आना
और ले आना वो क्षण भी संग
जब देखा था दर्पण में
मेरी सरिता को हमने।

वक्त मिले तो ज़रा टटोल लेना
अपने मन की परतों को
किसी सिलवट के बीच छुपी होगी
मेरी सिसकियां, मेरा क्रंदन
ज़रा लौटा देना।

तुम जानती तो हो
कोई ओर है अब तो धड़कन मेरी
पर जब सुनता हूं ध्यान लगा
धड़कन मेरी, तो पाता हूं
दो धड़कन के बीच जो शून्य है
उसमें तुम रह गई हो पीछे
चली जाओ ना।

चाँद
यही तो कहा था सरिता, तुमने मुझको
पर चांद पे तो सरिता बहती ही नहीं है
रहती ही नहीं है
व्यर्थ प्रसन्न हो गया था
मेरा चांद ना होना लौटा दो, यार
ताकि आ सकूं पृथ्वी पर वापस
लौटा दो न, यार।

गर लौटा दिया तुमने
सब कुछ
मैं भी बांध पोटली पटक आऊंगा
तेरी स्मृतियों की
किसी गहरे सागर में
जहाँ सरिता को
जाना ही है
ले लेना वहां से स्मृतियां अपनी।

- प्रभात

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