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Paheli

मेरे अल्फाज़

पहेली

Rajendra Singh

42 कविताएं

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इक पहेली सी है तू
इक सहेली सी है तू

यादें बनकर
मिलती है तू
यादें बनकर
बिछड़ती है तू

आलीशान हवेली सी है तू
कैसी इक पहेली सी है तू

अपने नैनों में बसा लेती है तू
फिर, नीर बना बहा देती है तू
हाँ, इक पहेली सी है तू
बिन बोले भी
इक सहेली सी है तू

तेरे और मेरे अरमाँ
यूँ ही सदा अगोचर रहकर
भूलेंगे, ना भुलायेंगे
यूँ ही सदा रुलायेंगे

तू खुश है
तो मैं भी हूँ
मेरी सदा सहेली है तू
सचमुच इक पहेली है तू।

- प्रभात

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