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मेरे अल्फाज़

नीड़

Rajendra Singh

40 कविताएं

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सचमुच सखी
तुम नीड़ हो इस परिंदे का
उसी वृक्ष की टहनी पर बसा
जहां मिला था कभी
उस कोयल से
हां वही
मीठा गाने वाली, चितकबरी-सी
नीड़ हो तुम, घोंसला मेरा

कैसे चतुराई से
अपने अंडे घोंसले में सरका
फुर्र हो गयी
कोयल है ना
स्वभाव है उसका
मैं पागल परिंदा आज भी
उन्हें अपना समझ पाल रहा हूँ
प्रेम उन पर डाल रहा हूँ।

तुम तो नीड़ हो मेरा, घोंसला मेरा
जानती हो ना सबकुछ
क्यूं नहीं धकेल देती
उस कोयल के अंडों को
फोड़ डालो ना
तोड़ डालो ना

क्यूं आज भी ताकता रहता हूं
राह उस कोयल की
कभी तो आयेगी वापस
अपने अंडे या बच्चे पाने
वो प्यारी कोयल,
चितकबरी-सी, मीठा गाने वाली

पर, तुम तो जानती हो ना
कहां आती है कोयल वापस
उन घोंसलों के पास
जहां धर जाती है अपने अंडे

फिर क्यूं नहीं समझाती मुझको
व्यर्थ है इंतज़ार मेरा
कोयल ना कभी आई है
ना कभी आयेगी वापस
गिरा दो न इन अंडों को
मेरे दिल के भीतर से

पर तुम नहीं करोगी ऐसा
नीड़ हो तुम, घोंसला मेरा
गिराना, मिटाना
तोड़ना, फोड़ना
नहीं है प्रकृति तुम्हारी
रखती हो सदा संभाल
इस परिंदे को
और
उन अंडों को भी
नीड़ हो तुम मेरा
और मैं
तुम्हारा उन्मुक्त परिंदा
हाँ पागल भी
ज़रा-सा ।।

- प्रभात

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