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Mann

मेरे अल्फाज़

बह गये थे मन के कितने टुकड़े...

Rajendra Singh

40 कविताएं

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मन

कहाँ है मेरा, मेरे ही पास
रह गया था वो तो, तेरे पास
तेरी स्मृतियों तले
खण्ड खण्ड हो, हर स्मृति तले।।

पहला टुकड़ा, मेरे मन का
ले गई थी तुम खुद ही
आई थी गाँव मेरे
जब पहली दफा।।

कितने पत्र, कितने पन्नें
कितने शब्द अंकित उन पर
किसे याद, कहाँ रह गये
पर हर शब्द में समाहित है
इक इक टुकड़ा, मेरे मन का।।

बह गये थे मन के
कितने टुकड़े उस सरिता में
विसर्जित कर आया था जहाँ
तेरे कुछ पत्र, टुकड़े कर
तेरे ही तो कहने पर।।

ऐसी कितनी ही स्मृतियां
समेटे है, इक इक टुकड़ा
मेरे मन का।
सारे टुकड़े मन के मेरे
जिन्दा है आज भी
तेरी स्मृतियों तले
तेरे ही संग।।

टूट गए थे मृत हो
कितने टुकड़े उस दिन
मन के,
जिस दिन जाना
बंधा है नसीब
किसी और संग मेरा।

बह गई थी सरिता
उस दिन
आँखों से निकल
कहीं दूर, बहुत दूर
समेटकर
मन के टुकड़े शेष।।

- राजेंद्र सिंह 

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