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Maykhana....

मेरे अल्फाज़

मयख़ाना....

Raj Bairwa

15 कविताएं

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हर किस्सा मानो जैसे वहाँ पुराना था,
कोई ख़ुश भी था कोई ग़मगीन भी,
वो जश्न नहीं बस एक मयख़ाना था,

रंगीन बोतलों में भरे एहसास रखें थे कई,
कुछ आज़ाद हो गए कुछ रहे वहीं,
दबे कुचले हर एहसासों का अजीब ठिकाना था,

धुँआ ही धुँआ चारों ओर फैला था,
कुछ के दिल जले थे, कुछ का जिस्म जलता रहा,
ऐसे सभी चीथड़ों का वो शमशान पुराना था,

कुछ ख़ुश भी थे इस बात से के हम अब हम नहीं,
जो बोझ ढोया उम्र भर ,बस अब और नहीं,
क़ैद के बाद की आज़ादी का वो आकाश सुहाना था,

जब वो गिलास शराब से भरा जा रहा था,
आँखों की नमी से मानो हर एहसास कहता जा रहा था,
कुछ ऐसा ही हाल-ए-दिल सभी को सुनना था,

तमाम ज़िन्दगी जो जी ना सका ख़ुद को,
उसी मौत का हर कोई जश्न वहां जश्न मनाता रहा,
उसी ज़िन्दगी से लड़ता वो इंसान वहाँ बेगाना था,

हर किस्सा मानो जैसे वहां पुराना था,
कोई ख़ुश भी था कोई ग़मगीन भी,
वो जश्न नहीं बस एक मयख़ाना था........!!!

- राज बैरवा'मुसाफ़िर'



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