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ye kitabe batanti hai.

मेरे अल्फाज़

ये किताबें बांटती हैं

rahul verma

10 कविताएं

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ये किताबें बांटती हैं अपनों को अपनों से
अपनों से दूर कर देती हैं, जब जोड़ती हैं सपनों से
जब मैं निरक्षर था, तब निरुत्तर था
अब कुछ सिख गया किताबों से, तो हर उत्तर हूँ
जो मुझे अब किताबों से सपने देखना आ गया है
तमीज की दहलीज़ लांघ गया, इन किताबों से सीखकर
अब तो ओहदे की अहमियत है न की रिश्तों की
बड़ी भीड़ में धकेल दिया इन किताबों ने
उजाले दिखा के अंधेरों की तरफ
अब हर रिश्तों का वजन पैसों से तोलता हूं
हर रिश्तों से किताब की भाषा बोलता हूँ
किताबों का ज्ञान मेरे दिमाग में भर गया
कि खाली कर गया, पता ही नहीं चला
इन किताबों ने छीन ली मेरी सारी खुशियां
अब किताबों के पन्ने भिगोता हूँ अकेले में आंसुओं से
अब देखता हूं उनको जिनको मैं अनपढ़ समझता था
जो समझ कि इन किताबो में गुम नहीं हुए
खुशहाल हैं, सब साथ हैं, सब पास हैं
गम में भी उनके चेहरे की खुशी
आज तक उन किताबों में नहीं पढ़ा
जिन किताबों का मैंने पढ़ा
अब रोता हूँ सब खोकर, अकेला होकर
पर अब दुनियादारी की किताबों से इतना तो सीख गया हूं
ये किताबें बांटती हैं अपनों को अपनों से।

- राहुल वर्मा

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