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Poverty and Life

मेरे अल्फाज़

जिन्दगी और ग़रीबी

Raghavendra Kumar

4 कविताएं

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क्या सर्दी और क्या गर्मी,
मुफ़लिसी तो मुफ़लिसी है ।

कांपती और झुलसती ज़िन्दगी चलती तो है ,
पर भूख की मंज़िल तो बस खुदकुशी है ।

गंदे चीथड़ों में खुद को बचाती,
इंसानी भेड़ियों से इज्ज़त छिपाती ।

हर रोज जीती और मरती है,
ये हमारी कैसी बेबसी है ।

सड़क के किनारे फुटपाथों पर ज़िन्दगी,
कीचड़ और कूड़े के ढेर में सनी है ।

खाली पेट ही इन्हें कोई रौंद जाता है,
पर ये लावारिस लाशें ख़ामोश कितनी हैं ।

किसी से ये कोई शिकायत नहीं करती,
चाहे गटर में फेंक दी जाये या नाले में ।

ये इन्सान कितना पत्थर दिल हो गया है,
कैसी हमारे महान देश की बदकिस्मती है ।

क्या सर्दी और क्या गर्मी,
मुफ़लिसी तो मुफ़लिसी है ।।

- राघवेन्द्र कुमार

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