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gam bikate nahin

मेरे अल्फाज़

ग़म बिकते नहीं

Rachna Saran

7 कविताएं

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न कहना तुम कि ग़म बिकते नहीं हैं
मुहतसिब यां कोई हमसे नहीं है।

मुहब्बत है, ये कारोबार ग़म का,
सुकूँ औ' चैन के जलसे नहीं हैं।

लगाते दाम क्यूं जज़्बों के भी तुम
खरीदें दिल को, वो लहज़े नहीं हैं।

छिपाती हैं ये आँखें हाले बातिन
चमकते अश्क़ भी ढ़लते नहीं हैं।

मुनासिब तो है, पर भूलूँ मैं कैसे
हरे हैं घाव, सब सूखे नहीं हैं।

पडे़ रिश्तों में नफ़रत की दरारें
तो मरके भी वो फिर जुड़ते नहीं हैं।

जली ऐसी गरीबों की ये बस्ती
कि चूल्हे अब यहां जलते नहीं हैं।

*मुहतसिब : हिसाब रखने वाला

- रचना सरन
  कोलकता, पश्चिम बंगाल

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