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मेरे अल्फाज़

मोह

Pravin Jha

1 कविता

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कबाड़ी वाले के ठेले पर थी
एक चादर की गठरी
चादर में लिपटी थी कुछ चीजें
वो चीजें जो खास थीं कभी
वो चीजें जिनसे आत्मीय लगाव था
एक मोह था जिनसे,
वो चीजें जिन्हें पाने में बहे थे
ना जाने कितनी पसीने की बूँदें
और जले थे जाने कितने खून के कतरे
लेकिन अब वो कबाड़ी थे
उनकी जगह ले ली थी नयी चीजों ने
अब मोह उन से था !

- प्रवीण झा

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