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mujhme hi kuchh bura sa hai

मेरे अल्फाज़

मुझमें ही कुछ बुरा सा है

Prabhakar Nath

1 कविता

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महाताब उसकी छत का बहुत पूरा सा है
चाँद मेरी ही आँगन क्यूं का अधूरा सा है।

गैरों से मेलजोल आज कल बढ़ा दी है मैंने
अपनों के हाथों फूल भी लगता छुरा सा है।

बहुतों ने है मोहब्बत से बहुत रुलाया मुझे
अब प्यार भरी नज़र भी लगे जैसे घुरा सा है।

बुराइयों को देख न आँखें फेर सका हूँ मैं
लगता है शायद मुझमें ही कुछ बुरा सा है।

- प्रभाकर नाथ 

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