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Beeta Bachpan

मेरे अल्फाज़

बीता बचपन

Piyush Kanti

5 कविताएं

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बीता बचपन

जीने की इस भाग-दौड़ में छूटा सबका हाथ
तेज हवा का झोंका आया गिरा शाख से पात

गुल्ली-डंडा, कंचे छूटे, छूटी डोर-पतंग
फोड़ रहे हैं आंखें अपनी कम्प्यूटर के संग

दाल-भात और चोखा भूले, भूले सांझ दोपहरी
डिब्बों में रहते खाते हैं, बने हैं पूरे शहरी

सारे भाव क्षणिक होते थे, रोना हंसना लड़ाई
ह्रदय बने अब जैसे पत्थर, भाव बन गए काई

प्यार बरसता था, मां थी जब भी डांट लगाती
अब उसकी खामोशी छलनी कर देती है छाती

लेट खाट पर पंखे की घर्र-घर्र में सोते रहना
बोतल के ढक्कनों का संग्रह लगता था तब सोना

छोड़ चवन्नी बिस्तर पर ही सो जाते थे थक कर
सोने के चक्कर में अब सोना नहीं मयस्सर

बचपन के संग बीत गया जो, लौट के फिर न आया
हुआ बड़ा हूं तो अब जाना क्या खोया क्या पाया।

- पीयूष कांति
  8527920515

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