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मेरे अल्फाज़

परवाह

Navneet Tiwari

1 कविता

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एक अनजानी परवाह होती है
कि इन मासूमों को
कलरव करने में,
कोई उलझन ना आ जाए

कुछ उम्मीदों के साये में
इस मौन संवेदना को
अपनाने में,
कोई अड़चन ना आ जाए

एक बचपन जब खिलखिलाता है
या जब गली से आवाज़ लगाता है
तो उस धार में
बह जाना चाहिए

और वक्त के साथ
नई दिशा नया आयाम देना चाहिए,
वक्त तो बीत जाएगा मगर
बचपन को कौन भुला पाएगा।

- नवनीत

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