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Ghazal

मेरे अल्फाज़

फ़क़ीरी, बादशाह के उसूलों पर नहीं चलती

Mohsin Aftab

4 कविताएं

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फ़क़ीरी, बादशाह के उसूलों पर नहीं चलती
ये वो कश्ती है जो पानी की लहरों पर नहीं चलती।

क़लंदर अपनी मर्ज़ी से कहीं भी घूम सकते हैं
ज़बरदस्ती किसी की भी हवाओं पर नहीं चलती।

हमारे दिल को हम समझा बुझा लेते मगर भाई
जो बच्चे ज़िद पे आ जाएं तो बच्चों पर नहीं चलती।

मियां, सहरा नवर्दी क़ैस के हिस्से में आयी है
कि लैला फूल पे चलती है शोलों पर नहीं चलती।

मुझे मालूम है मुझको दुआ से काम लेना है
दवा तो कोई भी अब मेरे ज़ख्मों पर नहीं चलती।

अदब से पेश आओ ऐ जहां वालों दीवानों से
दीवाने हट गए तो फिर दिवानों पर नहीं चलती।

अभी भी फैसले सारे बड़े बूढ़े ही लेते हैं
हमारे घर में बच्चों की बुज़ुर्गों पर नहीं चलती।

बुरे दिन जो हैं मेहमां ज़िंदगी में चार दिन के हैं
हुकूमत देर तक शब की उजालों पर नहीं चलती।

जो चलती है तो बस रब की ही चलती है जहां वालों
किसी की भी मोहम्मद के ग़ुलामों पर नहीं चलती।

तो हम सब साथ होते खुश भी होते थे बहोत 'मोहसिन'
सियासत की अगर तलवार रिश्तों पर नहीं चलती।

- मोहसिन आफताब
  ईमेल :mohsin.aaftab9@gmail.com
  मोबाइल : 7620785795
 7083785795

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