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I am a soldier

मेरे अल्फाज़

मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है

manish tiwari

49 कविताएं

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मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है

मैं कवि नहीं हूँ ऐ साहब,
ना मेरी कोई कविशाला है
मेरी मातृ-भूमि है भारत माँ,
जो देती हमें निवाला है
मत झाकों मेरे सीने में,
मैं बारूद की माफिक जलता हूँ
मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ,
मेरे अन्दर बस ज्वाला है।

नाका-बन्दी और गस्त लगाना,
मेरा हर साथी हिम्मतवाला है
जितने भी विषम हालात हुए,
उतना ही मैं मजबूत हुआ
ना फिक्स समय पर छुट्टी है,
ना मुझको टिकट ही मिलने वाला है
मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है।

झम-झम बारिस, सूरज की तपिस,
ये बर्फ जो तुम्हें जलाती है
हम इन सबके ही हमराही हैं,
ये साथ में हमें चलाती है
सीखा है हमने इनसे,
जीवन हर हाल में हंसने वाला है
मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है।

नफरत है हमको बस उनसे,
जो बीज बैर का बोतें हैं
अपनों को छुपा के आंचल में,
गिरगिट की तरह से रोते हैं
जीवन का हर कालचक्र,
हमसे टकराने वाला है
मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है।

हर पल जीवन का ऐसा है,
अब दो चार ही होना वाला है
हर रोज नये आदेश मिलगें-
पर कुछ और ही होने वाला है
संगीन उठाने वालों में भी,
कोई कलम चलाने वाला है
कड़वी लगती है शहद उनको,
जिनकों मीठी मधुशाला है
मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है।

वेतन-पेंशन की सारी टेंशन,
जब चाहो खत्म कर देते वो
पर कुछ तो मुद्दा चाहिए उनको,
जो उनको चमकाने वाला है
नेता जी को पांच साल में पेंशन,
निश्चित पेंशन मिलने वाला है,
और हम प्रहरी खातिर 60 साल पर,
नई पेंसन स्कीम का गड़बड़ झाला है
यह राजनीतिक उपहार,
जले पर नमक लगाने वाला है
मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है।

ना सही मुद्दों की बात करो,
ना निष्पक्ष किसी के साथ रहो
उलझा कर रखो दुनिया को,
मुद्दा तीन तलाक और हलाला है
किसकी खातिर खड़ा वो सीमा पर,
वो किसकी खातिर लड़ने-मरने वाला है
उम्मीद हर नई सरकार से रहती
शायद प्रहरी का भी अच्छा दिन अाने वाला है
मैं कवि नहीं हूँ ऐ साहब,
ना मेरी कोई कविशाला है
मैं सीमा का इक प्रहरी हूँ, मेरे अन्दर बस ज्वाला है।

- स्वतंत्र


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