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Ghazal

मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

makinahme siddiqui

6 कविताएं

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उक्ता गए हैं रोज़ के बारे गरां से हम
लाएं सुकूँ तलाश के बोलो कहाँ से हम
बेघर हुए ज़लील हुए ख़्वार हो गए
महरूम जब से हो गए उसकी अमाँ से हम
रहते वतन की खाक में मरने के बाद भी
जाएं ज़मीं ये छोड़ के कैसे यहां से हम
दौरे ज़दीद का अजब हम पे हुआ असर
उठते नहीं सहर की अब तो अजां से हम
तासीर मेरे लफ्ज़ भी रखते हैं आग की
करते नहीं हैं गुफ़्तुगू ऐसी ज़ुबाँ से हम
किसने हमारे खून को गद्दार लिख दिया
क्या सरहदों पे जाते नहीं यार जाँ से हम
जब से हमारे ख़्वाब में आने लगे सनम
लेने लगे हैं काम यक़ीं का गुमां से हम
लगता नहीं है ख़ौफ़ तेरी धमकियों से अब
गुज़रे हैं ज़िन्दगी तेरे हर इम्तिहां से हम
रानाइयां जहां की मुबारक हो आपको
अब तो मकीन चलते हैं तेरे जहाँ से हम।

- डॉ मकीन कौंचवी
 आरामशीन, भेल, झांसी उप्र
 मोब 09935382154


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