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मेरे अल्फाज़

हे! मूर्खों तुम अब भी मूर्ख हो

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4 कविताएं

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कुछ खूबसूरत पलों की तलाश में
वर्षों चला हूं
जीवन की इन सीमाओं से
उन सीमाओं की ओर
जो व्यक्ति को बांटती हैं
ढेर सारे तहजीबों के बंधनों में
आदर्शों के बंधनों में
और तय करती है जीवन जीने के
कुछ मानक पैमाने
फिर मान लिया जाता है
जीवन अब आदर्श सुख का भोगी है
पर कैसे ?
मैंने हमेशा खोजा है
अपने जीवन के अस्तित्व को
उस छोर तक
जहां के बाद जीव मुक्ति ही अंतिम विकल्प है
और मैं शायद हमेशा ही लौटा हूं
खाली हाथ
और मेरे हाथों में जगमागते रहे वह दुख के तारे
जिनको आदर्श स्थापित करने वाले लोग
करते रहे हैं नजरंदाज
क्योंकि यह उनकी परकाष्ठा में एक धब्बा है
और शायद भगवान भी उनको भूल गया है
या फिर वह खुद ही इसके दोषी है
क्योंकि वह मौन रहे हैं
जब दुनियां अपना अस्तित्व पाने के लिए लड़ रही थी
वह डर रहे थे अपनी आहूति देने में
जब दुनियां खून से इतिहास लिख रही थी
या फिर वह नियाहत ही मूर्ख थे
क्योंकि वह नहीं जान पाए
जिस लहू से यह इतिहास लिखा जा है
यह लहू भी इनका है
और जिस जमीन पर लिखा जा रहा है
वह भी इनकी अपनी है
फिर मैंने भी खुशी की तलाश में
छोड़ दिया भटकना
क्योकि मैं जान चुका था
कि वह अपने लिए खुद जिम्मेदार है
क्योंकि जंग अब भी जारी है
इतिहास अब भी लिखे जा रहे हैं
लहू और जमीन अब भी उनकी है, और
हे मूर्खों तुम अब भी मूर्ख हो।।

-अवकेश कुमार प्रजापति 



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