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Bujurg

मेरे अल्फाज़

हिसार से हमारे पाठक ललित कहते हैं, जो कभी अपने थे उन्हें पराया जताने लगे है लोग 

Lalit Dalmia

1 कविता

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ना जाने क्यों बुजुर्गो से कतराने लगे है लोग
न जाने क्यों उनसे सकपकाने लगे है लोग

बस में सफर करे तो उन्हें सीट नही देते
कुछ यूं जवानी में बुढ़ापा दिखाने लगे है लोग

सब समझ जाते थे वो जब तुम बोल नही पाते थे
ना जाने क्यों हर बात पर झल्लाने लगे है लोग

वो सोचते है कि वो कभी बूढ़े नही होंगे
ना जाने कैसी कैसी बाते बनाने लगे है लोग

वक़्त वक़्त की बात है "ललित" वक़्त बे-वक़्त बदलता है
जो कभी अपने थे उन्हें पराया जताने लगे है लोग 

- ललित डालमिया 
  हिसार, हरियाणा

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