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Mai Jinda Hu Tbabhi Kahta Hu

मेरे अल्फाज़

मैं जिन्दा हूं तभी कहता हूं

Kumar Ranjeet

6 कविताएं

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मुर्दों में नहीं रहता हूं

भावनाओं में नहीं बहता हूं
बस परम्पराओं को सहता हूं।

मैं जिन्दा हूं तभी कहता हूं,
भाषाओं ने हमें रोका।

मजहबों ने हमें टोका,
अब तो बैठकर चौखट पर घर की। 

सिसकियाँ लेता हूं
कोई रोता है तो रोता हूं। 

कोई हँसता है तो हंसता हूं,
मैं जिन्दा हूँ तभी कहता हूं। 

घमंड नहीं रखता हूं,
प्रेम को ही पालता हूं। 

इच्छाएं बड़ी हैं,
विडम्बनाओं से ही हारता हूं। 

मैं ही ये सोचता हूं,
मैं ही ये देखता हूं। 

क्यों????…
आखिर क्यों?????

क्योंकि मैं ही जिन्दा हूं….!!!!!
मैं ही जिन्दा हूं तभी तो कहता हूं….!!!

- कुमार रंजीत



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