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मेरे अल्फाज़

रंगों की होली

Krish Saklani

9 कविताएं

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रंगों की ये होली है , रंग जाओ इस होली में.
ना शरमाओ ना इतराओ, खुद को रंगने दो होली में.
इस प्यार भरे लम्हों की यादें, भर लो अपनी झोली में.
रंगों की ये होली है ,रंग जाओ इस होली में.

जो बीत गया सो बीत गया, शिकवे किसी से ना करना.
बीती बातों को भूल के रंग जाओ इस होली में.

रंगों की ये होली है, रंग जाओ इस होली में.
एक बार जरा तू याद तो कर, पिछली बार की होली को.
संग नाचे थे संग झूमे थे, वो साथ कहा इस होली में.
खुशकिस्मत हैं हम,जो सबका साथ मिला इस होली में.
ना जाने कौन कहा होगा, अगली बार की होली में.

रंगों की ये होली है, रंग जाओ इस होली में.
कोई अपना था जो छूट गया, ना जाने कहा वो छूट गया
ये वक्त ही शायद रूठ गया.
ना जाने कहा चले गए वो अबकी बार की होली में,
अब यादें ही है उनकी प्यार भरी इस होली में.
रंगों की ये होली है, रंग जाओ इस होली में.


उपरोक्त रचनाकार का दावा है कि ये उनकी स्वरचित कविता है। 
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