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मेरे अल्फाज़

दो प्रेमी...

  • Kavi Satya
  • मंगलवार, 18 जुलाई 2017
तुम सुन्दर निर्मल सागर हो ,
जैसे हो जसुलाला।
तुम सुन्दर सी पुष्प कली हो ,
जैसे हो मधुशाला ।।
हम अपनों से हुये पराये ,
क्या अपनाओगे ।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे ।।


झीलों झरनों और तटों पर,
कल कल ध्वनि गरजती ।
बागों में कोयल की बोली ,
विकल रागनी बजती ।।
दोनों स्वरों का हो समागम ,
क्या रचाओगे ।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे।



डाल डाल पे फिरता देखो ,
पपीहा करे तमाशा ।
पनघट की पनिहारी से है ,
दो बूँद की आशा।।
कदली सी बदली बन जाऊँ,
क्या बरसाओगे ।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे।।



वर्ण धर्म में बटा मनुष्य है,
सुन मेरे ओ यारा।
नारी जगत की श्रद्धा है,
सुन मेरी ओ बाला।।
मिटे वर्ण रहे देश धर्म ,
फिर क्या बसाओगे ।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे।।

हसते हसते तुम भी देखो ,
हो जाते मतवाले।
सुर्ख धरा की दिव्य ज्योति पर,
अधरों के हैं प्याले।।
अधरों की मदिरा बन जाऊँ,
क्या छलकाओगे।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे।।



आतंकी हिंसा करते हैं,
मरते अहिंसावादी ।
सब खूनों को ढाँक रही है,
गांधी जी की खादी।।
जन मिटे ईर्ष्या, बन जायें प्रेमी ।,
क्या सिखाओगे।
हम दोनों ने प्यार किया है ,
उसे निभाओगे।।


सागर की रेतों पर देखो ,
झूठे हैं सब वादे ।
उच्च गगन को वही चूमते,
जिनके नेक इरादे ।।
गहरे हैं सीपों के मोती ,
क्या दे पाओगे ।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे।।


सूरज ,चन्दा, तारे प्रियवर,
सब कुछ तुम पर अर्पण ।
सोना ,चांदी ,हीरा ,मोती ,
कोहिनूर का दर्पण।।
कुछ नहीं चाहिए केवल खुशियां,
क्या देपाओगे।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे ।।


प्यार की राहों में देखो तुम,
पड़ती बहुत दरारें ।
विरोधाभाष के उच्च शिखर पर,
आकर तुम्हें पुकारें ।।
जीवन की फिर राहें न बदले ,
क्या दिखाओगे।
हम दोनों ने प्यार किया है,
उसे निभाओगे ।।

कवि सत्य देव सिंह आज़ाद

उपरोक्त रचनाकार का दावा है कि ये उनकी स्वरचित कविता है। 
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