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My moon

मेरे अल्फाज़

मेरा चाँद

Kaushal Muhabbatpuri

7 कविताएं

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मेरा चाँद जाने किधर खो गया है,
देखो तो शायद दोपहर हो गया है।

लोग कह रहे हैं ये तो कर्फ्यू है,
मुझे लगा दिन में शहर सो गया है।

नशा अफीम का हो उतर भी जाए,
अब तो धरम भी जहर हो गया है।

तेरी टोपी, मेरी पगड़ी, है खतरे में,
दरिंदों का बेटी पर नजर हो गया है।

वो समाज जो बना कभी इंसान से,
अब उसमें बहुत जानवर हो गया है।

- कौशल मुहब्बतपुरी


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