आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Mother
Mother

मेरे अल्फाज़

माँ

Kaushal Muhabbatpuri

7 कविताएं

41 Views
'माँ मेरे रोने पर, पोंछती थी आँसू 
साड़ी के पल्लू से, बचपन में मेरे
अब भी पोंछती है, आँसू उसी तरह 
पर फर्क है
अब ये जानकर, कि उसके बेटे -बहू 
उसके जले हाथ की, जली रोटी की जगह
उसे घर से बाहर ,कहीं और रखने का फैसला
सुना दिया है।

मगर 
गाँव के
ईदगाह के मेले में 
हामिद ने 
माँ के
रोटी पकाने में जले हाथ को
बचाने के लिए
चिमटा खरीद लिया है।

हामिद की
माँ पोंछ रही है आँसू
साड़ी के पल्लू से 
चिमटा देख कर।

- कौशल मुहब्बतपुरी


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!