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मेरे अल्फाज़

कटी जब उँगलियाँ मेरी तो पल्लू नोच डाला था RP

अतुल अवस्थी

27 कविताएं

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कटी जब उँगलियाँ मेरी तो पल्लू नोच डाला था
जला अंगार से जब मैं तो मुँह से पोंछ डाला था

अगर उठने में देरी हो तड़पती थी वो लहरों सी
लगे साहिल से मिलने को समंदर ने उछाला था

मगर अब धड़कनों की धड़कने है मंद सी दिखती
लगे अब ख्वाब की तस्वीर को दिल से निकाला था

मैं चंदा से जो पूंछूं रूप का संसार क्यू बदला
तो बोला चांदनी से पूँछ लो कितना उजाला था

अतुल ऐसी नज़र है भावनाओ को लगी उसके
तड़प कर मर रहा, यादों का ख़ंज़र भोंक डाला था

अतुल अवस्थी*अतुल*
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