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मेरे अल्फाज़

लेखक और लेखनी

kartik srivastava

42 कविताएं

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लेखक और लेखनी

विवेचना अधिकारिणी
सम वय पादुर्भाव
लिख लिख कर बन लेखनी
हुआ सरस स्वभाव।।

कैसे कहूं मैं तुम को
नि:शब्द रहे तन मन
जो जन खोजा आपणो
खाली रहा सम मन ।।

तू लेखक मैं लेखनी
सारे जग की बात
भूले से न भूलती
लिखत पढ़त की आत ।।

गर तू भूला चल दिया
यह कैसा बर्ताव ?
इक इक पन्ना रम दिया
सारे तेरे हाव ।।

तेरा मेरा संग था
जैसे चांदनी चांद
तू मुख फेरा चल दिया
जैसे अजनबी जान ।।

तू मुझको बिसरा रहा
फिरा दिया मुख फेर
अगिनत में तू गिन रहा
कहां रही मैं हेर ।।

पोथी लात न मारिये
देती संबल आय
विनती करूं मैं आप से
न कर जग में हसाय ।।

- अनुपम कुमार श्रीवास्तव



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