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मेरे अल्फाज़

षोडशी

kartik srivastava

40 कविताएं

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षोडशी
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हुस्न और मय का मजा छिप कर ही आता है,
सामने ला दो सब जाता ही जाता है।

बददुआएं मय को ही मय ललक बढ़ाती हैं,
वो मज़ा कहां जो बंदी में आता है।

मय के लिए मयखाने से क्यों जगाते हो,
मुहब्बत-ए-मय तो अंदरूनी जनून होता है।

खुदगर्जी मय की अहमं मय से पनपता है,
नज़रअंदाज़ भी मय के लिए करता है।

खूबसूरती का नज़ारा भी मय तसव्वुर है,
बेपनाह मुहब्बत के लिए दीवाना हलाल होता है। 

मय का नशा मैं संग कदम दर कदम आफताब,
शमां के लिए जांनिसार मैं जवां होता है। 

बरसों चली ताउम्र मैं मय पी ,कब तक चलेगी,
षोडशी से बड़ी भी नहीं ,न उम्र दराज़ होता है।

- अनुपम कुमार श्रीवास्तव



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