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मेरे अल्फाज़

मुझे ही औरत कहते हैं

kartik srivastava

40 कविताएं

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मुझे ही औरत कहते हैं।

तुझे संभालते खुद फलित हूं
मुझे पूजते फल दूजे को
मैं निखरी थी,अब बिखरी हूं
नामकरण पूरा करते हो ।।
मुझे ही औरत कहते हो ?

मैं मां भी, तेरी जननी हूं
लाली तेरी मैं सजनी हूं
दिल बहना का लिए हुए हूं
रिश्तों की पूरी गठरी हूं ।।
मुझे ही औरत कहते हैं

मैं बाबुल घर से आई हूं
आशाओं का दीप जलाने
तिरे कुनबे में समाई हूं
आशा आभाओ महकाने ।।
मुझे ही औरत कहते है

बगिया महकी बगिया खिलती
तेरा अस्तित्व निखर गया है
धारा में अनबुझी पहेली
तेरा कुनबा संभल गया है ।।
मुझे ही औरत कहते हैं

क्योंकर बोले "'तू दोयामी "
मेरा दर्ज़ा गिरा दिया है
मेरा ही अस्तित्व सामने
मुझको ही खूब छला दिया है ।
मुझे ही औरत कहते हैं

- अनुपम कुमार श्रीवास्तव
   कानपुर


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