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मेरे अल्फाज़

नजाकत

kartik srivastava

42 कविताएं

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नज़ाकत

तुम याद करो न करो सजदा करता हूँ
मैं तेरे चौबारे में आता जाता हूँ ।।

मैं तेरा आशिक हूँ दीवाना न बना
तेरे लम्हों में जीता रहता हूँ।।

आवारा मैं नहीं आशिकी है मेरी
खारे पानी को मीठा करता हूँ।।

आईना छिप छिप कर नज़र चुराता है
उसकी चोरी पर न हूँ।।

आग इधर भी लगी और उधर भी लगी
हर वक्त नज़ाकत में, फर्क नजराता हूँ ।।

- अनुपम कुमार श्रीवास्तव,
   कानपुर

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