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himanshu jaiswal
मेरे अल्फाज़

हमारे पाठक हिमांशु कह रहे हैं, 'हौसलों की उड़ान बाकी है'

अभी तो जिया ही नहीं जीवन हमने
अभी तो पूरी जिन्दगी बाकी है

ये रात बीत जायेगी अंधेरों की
अभी तो रौशनी की नयी सुबह बाकी

अभी भी हारे नहीं हैं "हम"
अभी तो उम्मीदों की "जीत" बाकी है

अभी तो हारे भी नहीं हम "खुदगरजों" से
अभी तो सपनों से दो-दो हाथ बाकी है

अभी तो निकले हैं हम मंज़िल की राह पर
अभी तो पूरी मंज़िल बाकी है

ख्वाहिशों के धागों से उलझ कर टूटे हैं पंख मेरे
अभी तो हौसलों की उड़ान बाकी है

टूटे हैं सिर्फ पंख मेरे
अभी भी जिस्म में रूह और जान बाकी है

अभी तो नापी है सिर्फ मुट्ठीभर ज़मीं हमने
अभी तो पूरा आसमान बाकी है।

- हिमांशु जायसवाल
कल्याणपुर, कानपुर (उ.प्र)

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