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Ae insaan tu kya tha, kya ban raha

मेरे अल्फाज़

ऐ इंसान तू क्या था, क्या बन रहा है

Hamd Khan

3 कविताएं

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ऐ इंसान तू क्या था, क्या बन रहा है
क्यों लड़ रहा है, क्यों मर रहा है
क्या तू हैवान है
ज़रा अपने अंदर झांक
क्या आज भी तू इंसान है

मैंने, एक जवान ने अपना जीवन देश को समर्पित कर दिया
बदले में तूने मुझे क्या दिया
हाँ तुझसे ही पूछ रहा, तुम सबसे पूछ रहा
ये वो एख़लाक़ था, जो मेरा बाप था
आज उसी को नम आँखों से, कफ़न में सजा रहा था
आज मैं अपने अब्बा को, मिट्टी के गद्दे पे सुला रहा था
आज इंसान ही इंसान की नफ़रत का शिकार है
आज ख़ुदा भी अपनी मख्लूक़ से शर्मसार है
ये दर्दे दास्तान यहीं थमी नहीं है
क्यूंकि नफ़रत करने वालों की कमी नहीं है
ये एक सैनिक का घर था, जिसे तूने जला दिया
उसके सर से माँ का साया भी हटा दिया
फ़िर से एक चीख़ सरहद से आ रही है
शायद, किसी जवान की बहन कि इज़्ज़त दंगे में लूटी जा रही है
उस जवान की चीख़
चीख़ चीख़ के पूछ रही
इस नन्हीं सी जान की क्या खता थी
क्यों तूने उसे शर्मसार कर दिया
उससे भी दिल न भरा तो टुकड़े चार कर दिया
अब कौन है जो मेरे हाथों में राखी बांधेगा
अब कौन है जो मेरी खुशियों को बांटेगा
कैसे लौटूं उस घर की तरफ़
जिसे तूने श्मशान बना दिया
क्या मुँह दिखाऊं उस बहन की लाश को
जिसका भाई ना बचा सका उसकी लाज को
इस हादसे के बाद कभी न मेरे घर आफ़ताब आया
ज़मीं भी यूं रोई कि समंदर में सैलाब आया
ऐ इंसान तू क्या था क्या बन रहा है
क्यों लड़ रहा है क्यों मर रहा है
क्या तू हैवान है
ज़रा अपने अंदर झाँक
क्या आज भी तू इंसान है?

- हम्द खां

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