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toh mohabbat kaisi

मेरे अल्फाज़

तो मुहब्बत कैसी

Garima Anjul

15 कविताएं

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गर दोस्तों ने देखकर तुमको नाम उसका ले न चिढ़ाया तो मुहब्बत कैसी।
गर वह तुम्हें चुपके से देखके शरमा कर न मुस्कुराया तो मुहब्बत कैसी,
अपने लिए तो मांगते हैं सब ही दुआ रब से,
सलामती की दुआओं में तेरा नाम उसका न आया तो मुहब्बत कैसी,
अपनी नींदों को गंवा खयालों में उसको न जगाया तो मुहब्बत कैसी,
झलक पाने को उसकी सारा दिन खिड़की पर न बिताया तो मुहब्बत कैसी,
और देख उसे इतरा कर जो जु़ल्फों को ना लहराया तो मुहब्बत कैसी,
बारिशों में साथ पकड़ के उसका हाथ भीगने को दिल न ललचाया तो मुहब्बत कैसी,
सामने पाकर उसको सीने में धड़कनों का तूफ़ान न आया तो मुहब्बत कैसी,
उसके पसंद के गाने को जो बार बार न गुनगुनाया तो मुहब्बत कैसी,
रात को देखा जब आसमां चांद में वो ही नज़र न आया तो मुहब्बत कैसी,
घंटों तक उसकी तस्वीर को छिपकर ना निहारा तो मुहब्बत कैसी,
किताब के आखिरी पन्ने पर लिख के उसका नाम न सजाया और मिटाया तो मुहब्बत कैसी,
लड़े जिसकी खातिर जहां से उसकी ख़ता को दिल से लगाया तो मुहब्बत कैसी,
लगा सीने से तस्वीर आंसुओं से रात तकिया ना भिगाया तो मुहब्बत कैसी,
देखकर निगाहों को भी जो उनकी खामोशी को ना पढ़ पाया तो मुहब्बत कैसी,
न वो बन सके जो अपने दिलबर फिर भूलने, दूर जाने की बातें करते हैं सभी,
उसकी खा़तिर चाहत को दफ्न करके दोस्ती का कफन न उढ़ाया तो मुहब्बत कैसी।।

- गरिमा
  मौलिक रचना

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