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ik ladki ki baten vo college ki raten

मेरे अल्फाज़

इक लड़की की बातें वो कॉलेज की रातें

Dhanawat Sanjay

23 कविताएं

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इक लड़की की बातें वो कॉलेज की रातें
याद करती है वो तब ही ये लब्ज आते हैं
नहीं तो दिल के कलम बीमार पड़ जाते हैं।

आजकल दिलों की सरहदों पर
जहां अपनी यादें मिला करती थीं
कोई तनाव सा है
कोई रंजिश का मामला है।

हर रोज इन शरद रातों में
बंद कमरे में इक दूधिया बत्ती है
जिसका फ़टे इक गमछे के टुकड़े से
गला घोंटकर गहरी सांसें लेकर
हलकी सी छलकी सी
नीली मंद रौशनी में
खाली से सुनसान ओझल बातों में
दुनिया से दूर अकेले में
तेरी यादों के अंधेरे में
आधी आंखें बंद कर
सारे दर्द दिल पे रखकर
कभी थोड़ी देर मरकर
फिर मुस्कुराके उठके
देर रात जागकर
तुझे गहरे जिंदगी के कुंए
के पारे पे बिठा कर
आवाज देते हैं
शायद मेरी फरियाद सुनकर
तुम मिलने आते हो
बरसों के उखड़े तलखत
बातों के फ़टे जख्म
सिलने आते हो
हम तेरे सामने रोने लगते हैं
तुम भी पिघलने लगते हो
मुझसे लिपटने लगते हो
जब चाँद तारे मेरा बहार
इंतजार कर चले जाते हैं
तब कहीं दूर से
रात भर चलके आयी
थकी हारी वो पागल किरण
मेरी खिड़की खटखटाती है
मुझे खयालों से जगाती है
तब लगता है
इक सर्दी की लम्बी रात भी
तुझे सोचने को काम पड़ जाती है
इक सर्दी की लम्बी रात भी
तुझे सोचने को काम पड़ जाती है।

- संजय धानावत 

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