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मेरे अल्फाज़

दीपमाला से सजी हैं कोठियां, झोपड़े में दिये की लौ भी नहीं

अतुल अवस्थी

27 कविताएं

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दीपमाला से सजी हैं कोठियां,
झोपड़े में दिये की लौ भी नहीं।

वहाँ पर मिष्ठान औ पकवान हैं,
यहाँ आँसू हैं मगर जौ भी नहीं।

जिंदगी परिहास उनसे कर रही,
फ़िर भी जीवन पर उन्हे विश्वास है।

आसमानी फुलझड़ी को देखकर,
खुश हैं बच्चे तीली की बस आश है।

जो सजीले ख्वाब थे मन में सजे,
बहिया को वह ख्वाब सारे भा गए।

नियत की नजरें लगी या नियति की,
लहर अरमानों की गठरी पा गए।

थी जमींदारी बड़ा घरबार था,
फूस की मड़ई सड़क अब द्वार है।

यह दिवाली शाप सी है लग रही,
लग रहा है स्वांस से तकरार है ।

ईट का चूल्हा भी ठंडा है पड़ा,
शेरु दो दिन से सिमट कर सो रहा।

टेंट खाली सुबकता परिवार है,
रामू छाती से लिपट कर रो रहा।

दूर पर जलता दिया है दिख रहा,
पर डगर पर उनके तो अँधियार है।

कुछ चले थे दीप जलवाने मगर,
उनकी छत पर बहुत ही उजियार है।

- अतुल अवस्थी 'अतुल'

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