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मेरे अल्फाज़

gazal

Dandpani Nahak

19 कविताएं

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हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं,
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं। 

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया,
हमें भी नज़ारे कहाँ देखने हैं। 

जिन्होंने कभी लूटना नहीं छोड़ा,
उन्हें क्या बतायें उन्ही के धड़े हैं। 

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है,
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं। 

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक'जाओ,
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बने हैं। 

- दंडनायक साहनी

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