आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Sarita

मेरे अल्फाज़

सरिता

Amresh Singh

37 कविताएं

7 Views
___सरिता___

शिखरों पर बर्फ पिघलती है,
तब सरिता नयी निकलती है।

पथरीले घाटों से बहकर,
तपन मृगशिरा की सहकर।
चिन्तनरत देह बनी दुर्बल,
छलता निज अंग कहीं मरुथल।
होती न किन्तु कर्तव्यविमुख,
जीवन सतपथ पर चलती है।
तब सरिता नयी निकलती है।

आलिंगन बद्ध किनारों से,
कहती कुछ मधुर इसारों से।
धीरे से हवा छूकर तन को,
अहलादित करती है मन को।
क्षण-क्षण में धर कर नये रूप,
जब उन्मुक्त लहर मचलती है।
तब सरिता नयी निकलती है।

अधरों पर मधुमास लिये,
मन में कुछ गहरी प्यास लिये।
महामिलन की आस लिये,
धड़कन ज्यों बोझिल सांस लिये।
द्रवीभूत होकर पीड़ा जब,
संतापों पर ढलती है।
तब सरिता नयी निकलती है।

अविरलता में विश्राम कहां,
पथ में सिंदूरी शाम कहां।
श्रमशील मनन,परहित चिंतन,
संकल्पित तपसी सा जीवन। 
"अमरेश" अँधेरे से लड़कर,
जब दीपशिखा खुद जलती है।
तब सरिता नयी निकलती है।

- अमरेश सिंह भदोरिया

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!