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मेरे अल्फाज़

कोहरा बहुत घना है

Amresh Singh

37 कविताएं

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______|||||_कोहरा_|||||______

कोहरा बहुत घना है ,
कोहरा बहुत घना है ।

दूर हुयी सूरज से लाली ,
रश्मियों ने ख़ामोशी पाली,
सर्द हुयी मौसम की राते ,
घोसलें में पंछी घबराते ,
जाड़े की ऋतुओं में दिन,
रातों का पर्याय बना है ।
कोहरा बहुत घना है ,
कोहरा बहुत घना है ।

कुहासे में छिप गयीं बस्तियां ,
काँपती ठिठुरन में अस्थियां ,
सिकुड़न आयी अंतड़ियों में ,
अलाव जलते झोपड़ियों में,
आंधी के आघात सहने को ,
परदा द्वार तना है।
कोहरा बहुत घना है ,
कोहरा बहुत घना है ।

जीविका की टूटी आशाएं ,
ढकी धुंध में सभी दिशाएं ,
भूँख से बच्चे ब्याकुल होते ,
रोटी के सवाल पर रोते ,
अभाव के संग जीवन जीना ,
समाज में अभिशाप बना है ।
कोहरा बहुत घना है ,
कोहरा बहुत घना है ।

खांई ज्यों-ज्यों बढती जाती ,
चौड़ाई भी रूप बढाती ,
निर्बल सांसो का क़हर जो टूटा ,
समझो ज्वालामुखी है फूटा ,
जब-जब भड़की है चिनगारी ,
रूप उसका अंगार बना है ।
कोहरा बहुत घना है ,
कोहरा बहुत घना है ।

- अमरेश सिंह भदोरिया


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