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मेरे अल्फाज़

बदरी बहुत घनी है

Amresh Singh

37 कविताएं

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समृद्धि के सिर पर ईमान की छतरी तनी है।
बदरी बहुत घनी है, बदरी बहुत घनी है।

आंखों से कुछ दृष्टिहीन
हाथों से थामे दूरबीन
देख रहे हैं दूर क्षितिज को
भेद रहे पहचान परिधि को
रेगिस्तान की रेती में
ढूंढते शाम शबनमी है।
बदरी बहुत घनी है, बदरी बहुत घनी है।

ऋतुओं में आयी विकृतियां
रूप बदलती हैं आकृतियां
कोयल मौन बोलते दादुर
तरुणाई कुछ है सृजनातुर
आसमानी कैनवास पर
धुंधली सी तस्वीर बनी है।
बदरी बहुत घनी है, बदरी बहुत घनी है।

कलम लिख रही है परिहास
सच को कौन बधाये आस
इंद्रधनुष में रंग नए है
शोषण के सब ढंग नए है
गोल-गोल काले छल्लों सा,
धुआं उगलती चिमनी है।
बदरी बहुत घनी है, बदरी बहुत घनी है।

आंचल में ममता मज़बूर
और भी बदल गए दस्तूर
नियति ने बदला है इरादा
सिसकियां भरती मर्यादा
कथनी-करनी में "अमरेश"
अस्तित्व की ठना-ठनी है।
बदरी बहुत घनी है, बदरी बहुत घनी है।

- अमरेश सिंह भदोरिया


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