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Ahasaas kee girah

मेरे अल्फाज़

एहसास की गिरह

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एहसास की गिरह
धीरे-धीरे खोल रही
सुनो ना तुम्हारे साथ का
हां, वही छोर ढूंढ रही हूं।

तुम खोये नहीं कहीं
यहीं हो मेरे जीवन में
वक्त के ताने-बाने में उलझ के
हां, वही डोर ढूंढ रही हूं।

सांसों से सुलझे तुम
लकीरों में छुप रहे हो
नसीबों का फसाना अजीब
हां, वही छोर ढूंढ रही हूं।

खामोशी ली वफा
गैरों ने सुनायी है रजा़
रिश्तों का बोझ लिए चीख़
हां, वही शोर ढूंढ रही हूं।

दिल को मलाल यही
कमी मुझमें तेरे साथ नहीं
बात-बात में जो फिसल गयी
हां, वही ज़ोर ढूंढ रही हूं।

देखो, हो कुछ न बाकी
तुम में जो मेरा वो खो जाएं
सुकून का एहसास मिले बस
हां, वही डोर ढूंढ रही हूं।

जीवन के गिरह खुशी
नंदिता के रूह में छिपी
बस वही एहसास तुम
हां, वही छोर ढूंढ रही हूं...!!

- नंदिता तनुजा 'रूह'
  लखनऊ- उत्तर प्रदेश

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