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मेरे अल्फाज़

उसके गांव की यात्रा

Adv Pukhraj

2 कविताएं

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उसने पूछा...मेरा गांव कैसा लगा ???
और मैंने कुछ यूं बयां किया। 

मैंने उन सभी राहों को देखा,
ज़िनपे तुम खेला करती थी। 
मैंने उन सभी गलियों और चौबारों को देखा...
जिनपे तुम गुजरा करती थी। 

मैंने झरौखों को देखा, मैने रोशनदान को देखा,
मैंने खिड़कियों और दरवाजों को देखा....
जहां कभी तुम बैठा करती थी ||

मैने पेड़ों को देखा...पत्तों को देखा....
धूप को देखा....छांव को देखा....
और निर्बाध बहती हवा को देखा...
जहां कभी तुम अपना पसीना पोंछा करती थी ॥

मैने गलियों को देखा...कच्ची सड़कों को देखा...
फटे कागज की उड़ती चिठ्ठी को देखा....
तुम्हारे गांव की सौंधी मिटठी को देखा...
जहां कभी तुम बेसबब दौड़ा करती थी ॥

हां! मैंने तुम्हारे गांव की हर एक चीज को देखा...
और सबसे यही पूछा कि कोई तो बताओ...
इस हसीं को तुमने जाने किस लहजे से बनाया है।
बिलकुल मोम की गुड़िया के जैसे सजाया है। 

सबके चेहरे पर नूर था...बस मेरे चेहरे पर कुछ और जरूर था...
हां! जहां भी देखा, जहां भी महसूस किया बस तुम्हारा ही सुरूर था.
और तुम्हारे गांव की हरेक चीज ने मुझसे पूछा कि....
बताओ...ऐ अजनबी तुम कौन हो ??
मैंने कहा! मैं भी इसी मंजिल का मुसाफिर हूं....
तुम जिसके दीवाने हो....
मैं उसी की तलाश में फिरता इक काफिर हूं ...
बस! मंजिल की तलाश में भटकता इक मुसाफिर हूं। 

- पुखराज 


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