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Ever lasting hope
मेरे अल्फाज़

बूढ़ी होती आंखों को इंतज़ार...

  • Aarti Sharma
  • मंगलवार, 18 जुलाई 2017
बरस बीत गये कई... उस सूई और धागे की कश्मकश मे..
पर वो डोर नहीं बंध पाती...आंखो के धूंधलके से हार जाती है..
कांपते हाथों ने जब से उस लिफाफे को खोला है...
एक माप उसके ज़हन में है..जो अब धीरे धीरे बचपन को पार करेगी..
होने को तो फासला मीलों पार का ही है...और बाट जोहना अब उस उम्र की नीयती है..
फिर भी आस लगाये वो तारीख़ें पढ़ती है...
आज एक और बरस निकला है..माप भी कुछ बढ़ी होगी..
खैर अब फिर उसी कश्मकश में जुटना है..
धागा पिरोने पड़ोस में फिर आवाज लगाती है...


उपरोक्त रचनाकार का दावा है कि ये उनकी स्वरचित कविता है। 
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