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गली...

Yogesh Rathor

9 कविताएं

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ग़ज़ल:

गली तेरी आज फिर से सूनसान खड़ी है
झूठे वादों को समेटे आज वीरान खड़ी है,

बेवफ़ाई नाम लूँ तो तौबा कर लेंगी साँसें,
फिर उसके इश्क़ में हुई बदनाम खड़ी है,

किस क़दर कह दूँ है ये भरोसे की दुनिया,
आइने के टुकड़ों में भी अनजान खड़ी है,

ज़िंदगी बिखर रही है रिश्ते सम्भालते-2,
अब साँसें भी खुद की बनी मेहमां खड़ी हैं,

ख़ुदगर्ज़ हुआ यश तो रिश्ते कौन संभाले,
चहरे पर लिए मासूमियत नादान खड़ी हैं,

आज छोड़ के बाग़-ए-फ़रिश्तों का सारा,
इंसानियत ज़िन्दों के क़ब्रिस्तान खड़ी है।


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