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remembering kavi mahendra huma by ashok bansal

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'हुमा' की नसों में ख़ून भी दौड़ा और कविता भी

अशोक बंसल, मथुरा

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बात दो साल पुरानी है। कविता की ताक़त  को मैंने अपनी आँखों से देखा। मथुरा के लाडले शायर और कवि महेंद्र 'हुमा' की बूढ़ी काया अस्पताल के बिस्तर पर एकदम शांत पड़ी थी। हाथ-पैर सफ़ेद। हीमोग्लोबिन का स्तर चार रह गया था। पैर की हड्डी कुछ ही दिन पहले टूटी थी। होंठ फड़फड़ा रहे थे पर आवाज़ गायब थी। डॉ. राजकुमार चतुर्वेदी ने ख़ून चढ़ाने का फैसला लिया। एक, दो और फिर तीन बोतलें चढ़ते ही कवि हुमा ने मानो हुंकार भरी। वे न कराहे और न पानी की मांग की। उनके अधरों से रपटे इस शेर को पास बैठे तीमारदार दोस्तों ने सुना तो  सभी की  भुजाएं  हुमा को सीने से लगाने को मचल उठी। शेर था, 

''दर्द हाथों की लकीरें बन गया, 
ये हमारा मुस्तकिल मेहमान है'' 


सन 1933 में जन्मे महेंद्र हुमा ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री लेकर आगरा के अफ़ज़ल साहब उस्ताद के सानिध्य में ग़ज़ल लिखना शुरू किया।  इसके बाद हुमा ने अपनी कविता में शोषित-पीड़ित जन की आवाज़ को स्थान देना शुरू किया। आज़ादी के बाद सत्ता पर काबिज़ हुक्मरानों के आडम्बरों पर जमकर चोट करने वाले हुमा बहुत जल्द ही देश के नामी गज़लकारों की पंक्ति में शरीक हो गए। मथुरा के काव्यप्रेमी हुमा की कविता को सुनने को मचलने लगे। हुमा की कलम की नोंक से सत्ताधीशों के षड्यंत्रों का ख़़ुलासा ही नहीं होता बल्कि इंसानी जीवन की विडम्बनाओं और विसंगतियों पर भी हुमा की कविता सर उठा कर बोलती है। 

जब हुमा के बेटे पिता की जर्जर काया को अस्पताल लाए तो 82 साल के हुमा के फिर से जी उठने की उम्मीद न थी। लेकिन हुमा मौत को ललकारते दिखाई दे रहे थे। हुमा को देखकर मुझे अंग्रेज़ी कवि राबर्ट ब्राउनिंग का स्मरण हो आया। ब्राउनिंग ने अपनी एक कविता में शायद यह लाइन हुमा जैसे योध्दा को देखकर ही लिखी होगी, 

I was ever a fighter so one fight more. 

ख़ून की तीन बोतलें चढ़ते ही हुमा के शरीर में जबरदस्त हलचल हुई और  मथुरा के एक टीवी पत्रकार योगेश खत्री को सामने बैठा देख सुनाने लगे, 

''तुम तो सब सच कहने आये हो, 
सच कहो हौसला भी साथ लाये हो'' 

''यूं तो जी लेना आसान है, 
क्या करू मेरे अंदर इंसान है 
आदमी बनना बहुत दुश्वार है, 
जानवर बनना बहुत आसान है'' 


अस्पताल से घर जाते हुमा ने डाक्टर से 'कौन सी दवा कब लेनी है या अब फिर कब आना' जैसे सवाल नहीं पूछे। बस सूखे होंठों पर जबरन मुस्कान लाते इतना बोले, ''डॉक्टर आपने मुझे जिता दी ज़िंदगी की एक और जंग''। डॉक्टर ने जबाब दिया, ''हुमा साब, आपने ये जंग मेरी वजह से नहीं अपनी बेबाक शायरी के कारण जीती है।'' 
 
मैं सोचने लगा जिस कवि-शायर की कविता में हुमा जैसा दम हो उसे कोई कैसे मार सकता है ! 
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