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interview of famous Bengali novel writer shankar

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जीवन ही तो एक चौरंगी है, जीवन और क्या है?

कृपाशंकर चौबे

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कोलकाता के लिए चौरंगी सिर्फ एक इलाका नहीं, एक संस्कृति है। आज भी कोलकाता को समझने के लिए चौरंगी को समझना जरूरी है। इसी चौरंगी को लेकर शंकर का उपन्यास 'चौरंगी' सिर्फ कोलकाता का नहीं,सम्पूर्ण मानव व्यवहार का चित्र प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में इतने अधिक विविधरंगी चरित्र हैं कि इसे सहज ही मानव जीवन की महागाथा कहा जा सकता है पर महागाथाओं की तरह इसमें कोई महानायक नहीं है इसलिए यह उपन्यास कोई आदर्श भी नहीं रचता। यह केवल परत-दर-परत मानवीय व्यवहार के विभिन्न पहलुओं को खोलता रहता है। यही वजह है कि कई बार एक ही व्यक्ति के चरित्र के दो रूप उभर कर सामने आते हैं।

मुझे बांग्ला के विशिष्ट उपन्यासकार शंकर से पिछले दो दशकों के दौरान अनेक बार अंतरंग बातचीत करने का सुयोग मिला है, किंतु 25 अक्तूबर 2017 को दोपहर में ऐसा संयोग बना कि कोलकाता के चौरंगी इलाके में उनसे सिर्फ ‘चौरंगी’ उपन्यास पर घंटाभर बातचीत हुई। चौरंगी इलाके में ही कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई का दफ्तर है, जहां शंकर सलाहकार के रूप में सेवाएं देते हैं।

उपन्यास छपने के 55 साल बाद लेखक ने याद किया, '10 जून 1962 की तारीख मेरे लिए विशेष रूप से स्मरणीय है। उसी दिन ‘चौरंगी’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। छपी किताब देख निश्चिंत होकर उसी दिन शाम को उत्तरपाड़ा गया और विवाह मंडप में बैठा। वंदना यदि जीवित रहतीं, तो हम अपने विवाह की 55वीं वर्षगांठ भी मनाते। किंतु व्यक्तिगत जीवन में निःसंगता मेरी चिरसंगी रही।'

लेकिन पाठकों ने तो आपको निःसंग कभी नहीं रहने दिया?
हां, पाठकों के अपार प्रेम के समक्ष मैं आत्मसमर्पण करता हूं। दोनों हाथ जोड़कर। पाठकों का प्रेम ही था कि मेरी पचहत्तर किताबों के कई-कई संस्करण निकले। बांग्ला में तो ‘चौरंगी’ के एक सौ सत्रह संस्करण निकल चुके हैं। हिंदी में भी कई संस्करण आए हैं। हिंदी संस्करण निकालने के लिए राजकमल के ओमप्रकाश जी ने कलकत्ता आकर मुझसे अनुबंध किया था। राजकमल चौधरी ने ‘चौरंगी’ का अनुवाद किया था। हिंदी संस्करण 1964 में आया था। हिंदी से ही भारत की दूसरी भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ। रूसी अनुवाद तक हिंदी से हुआ। यहां तक कि हिंदी संस्करण पढ़कर ही विक्रम सेठ इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने पेंग्विन वालों से अंग्रेजी अनुवाद छापने की अनुशंसा की। 
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