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Ghazal

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वो समझते भी क्या हैं चीज़ हमें

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अपना माने, कहे अज़ीज़ हमें
मिल गया है वो अल-हफ़ीज़ हमें।।

जिनकी नज़रों में कल न थे कुछ भी
अब वही कह रहे फ़रीज़ हमें।।

बात करने की ख़ुद तमीज़ नहीं
और कहते हैं बद-तमीज़ हमें।।

बद-तमीज़ी भी हम दिखा देंगे
गर सिखाएंगे फिर तमीज़ हमें।।

ज़ेहन-ओ-दिल से बीमार हैं ख़ुद ही
और समझे हैं वो मरीज़ हमें।।

तोड़ देंगे गुरूर सब उनका
वो समझते भी क्या हैं चीज़ हमें।।

तल्ख़ अंदाज़ है 'अकेला' पर
ये भी भाया, लगा लज़ीज़ हमें।।

- अकेला इलाहाबादी

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