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atul sinha remembering urdu poet bashir badr

मेरा शहर मेरा शायर

जब बशीर बद्र को अपना शहर मेरठ अजनबी लगने लगा...

अतुल सिन्हा, नई दिल्‍ली

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तीस साल पहले के मेरठ को याद कीजिए। हर तरफ आग की लपटें, चीख पुकार, दंगे का वो खौफ़नाक मंज़र जिसने पूरे शहर को तकरीबन 6 महीनों तक कर्फ़्यू के सन्नाटे और दहशत में जीने को मजबूर कर दिया। मलियाना और हाशिमपुरा इतने सालों के बाद भी उस दौर को यादकर सिहर उठते हैं। शास्त्रीनगर, बेगमपुल, जलीकोठी, घंटाघर... कितने इलाक़ों को याद करूं। हर तरफ खौफ़ का आलम।

पागल और वहशी दंगाइयों को बस क़ौम नज़र आ रही थी, इंसान नहीं। शहर का संभ्रांत इलाक़ा माना जाने वाला शास्त्रीनगर जल रहा था और यहीं जल रहा था एक ऐसे शायर का आशियाना जिसने बड़ी मशक़्क़त और जद्दोजहद के साथ इसे बनाया था। उसकी शायरी बरसों से लोगों में मोहब्बत भरती रही, लेकिन नफ़रत के शोलों ने मोहब्बत के इस शायर को कुछ ऐसा लिखने को मजबूर कर दिया - 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में 


बशीर बद्र की शायरी तब हर किसी की ज़ुबान पर होती थी। मेरठ को इस बात का फ़ख्र था कि बशीर साहब इस शहर में रहते हैं। यहां की हर महफ़िल बशीर साहब के बग़ैर अधूरी रहती। लेकिन उस भयानक दौर में अपने भी पराये हो गए। न कोई पड़ोस रहा, न कोई रहनुमा रहा। एक तरक़्क़ीपसंद और मोहब्बत का शायर बेघर हो गया। बेग़म राहत और नन्हें बेटे नुसरत के साथ बशीर साहब एक परिचित के गैराज में रहने को मजबूर हो गए। नफ़रत के इस आलम से आहत बशीर साहब को अब ये शहर भी अजनबी सा लगने लगा। उन्होंने लिखा - 

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है, जरा फ़ासले से मिला करो 


अमर उजाला का मेरठ में यह शुरूआती दौर था। हमसब महीनों तक मोहकमपुर के अपने ऑफिस में रात गुज़ारते। छत पर रातभर चीत्कार सुनाई देती, बम बम भोले और जय श्रीराम के नारे गूंजते, दूर से आग की लपटें नज़र आतीं और कई बार देर रात लाशों के जलने की बदबू माहौल में घुल जाती। देश विदेश के पत्रकार दंगा कवर करने मेरठ आते तो अमर उजाला का दफ़्तर उनके लिए सबसे मददगार जगह साबित होता।

हमारी सच्ची और बेबाक रिपोर्टिंग के चर्चे दूर-दूर तक थे और पीएसी के आतंक का ख़ुलासा करने के साथ-साथ अमर उजाला ने जिस तरह की स्पॉट रिपोर्टिंग का नमूना पेश किया था, उससे अख़बार की साख जम गई थी। हर तरफ लोग अमर उजाला ढूंढते थे। बशीर साहब के बारे में भी हमने खूब छापा। उसी दौरान उनसे मिलने उस गैराजनुमा घर में भी गया जहां बशीर साहब एक कुर्सी पर हताश और खोये-खोये से बैठे थे।

अमर उजाला वह भी पढ़ते थे और उन्होंने तभी हमें ये लाइनें भी सुनाईं जिनका ज़िक्र हमने ऊपर किया है। वो टूटे हुए थे लेकिन हताश नहीं थे। उन्होंने तब कहा था कि फ़िरक़ापरस्त ताक़तें चंद वक़्त की मेहमान हैं, ये जुनून, ये नफ़रत का आलम जैसे आया है वैसे ही गुज़र जाएगा। लेकिन वे इस कदर आहत थे मानो उनके भीतर किसी ने बहुत गहरा ज़ख्म दिया हो।  आगे पढ़ें

कहने वाले दो मिसरों में सारा किस्सा कहते हैं

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