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नामचीन शायरों कवियों की कहानी, उनके शहर के बाशिंदों की जुबानी

जब बशीर बद्र को अपना शहर मेरठ अजनबी लगने लगा...

  • अतुल सिन्हा, नई दिल्‍ली
  • सोमवार, 24 जुलाई 2017

मशहूर शायर बशीर बद्र का फ़लक बहुत बड़ा है। वो ख़ुद को तरक़्क़ीपसंद शायर कहलाना पसंद नहीं करते और हमेशा मोहब्बत के शायर ही रहना चाहते हैं। क्योंकि वो मानते हैं कि जहां मोहब्बत है, वहीं तरक़्क़ी है - चाहे इंसान का हो, चाहे समाज का।

दाग़ का नाम लो तो फ़लक से चांद हंसता है

  • संजय अभिज्ञान / अमर उजाला, नई दिल्ली
  • मंगलवार, 18 जुलाई 2017

दाग़, मीर और ग़ालिब की तरह मेरा बचपन भी चांदनी चौक के आसपास की गलियों में बीता।

दिल्ली का वो पहला सुख़नवर जिससे मेरा साबका पड़ा...

  • प्रताप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
  • शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

दिल्ली अब महज़ एक शहर नहीं रह गया है। बरतानिया राज के ख़ात्मे के बाद से नई सल्‍तनतों में तकसीम होता रहा, शिखर राजनीति के रजवाड़ों में धंसा रोज़ चेहरे बदलता, एक अफ़लातून महानगर है।

हसरत मोहानी: "हज़ार खौफ़ हों पर ज़ुबां हो सच की रफ़ीक़"

  • पंकज शुक्ल / अमर उजाला, नई दिल्ली
  • रविवार, 2 जुलाई 2017
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