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urdu poet sheen kaaf nizam by rakesh mishra

मैं इनका मुरीद

शीन काफ़ निज़ाम: अब तो अक्‍सर नज़र आ जाता है दिल आँखों में, मैं न कहता था कि पानी है दबाये रखिये

राकेश मिश्रा, वर्धा

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पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाए 
ज़ालिम हवा-ए-शहर है इज़्ज़त भी ले न जाए 

बर्बादियाँ समेटने का उस को शौक़ है 
लेकिन वो उन के नाम पे बरकत भी ले न जाए 

आदिल है उस के अद्ल पर हम को यक़ीन है 
लेकिन वो ज़ुल्म सहने की हिम्मत भी ले न जाए 

ख़ुद से भी बढ़ के उस पे भरोसा न कीजिए 
वो आइना है देखिए सूरत भी ले न जाए 


निज़ाम साहब शायद इससे इत्तेफाक न रखें लेकिन जहालत, संकीर्ण और घोर असहिष्णु इस समय में यह ज़ाहिर करना ज़रूरी लग रहा है कि उर्दू के मशहूर शायर शीन काफ़ निज़ाम दरअसल शिव कृष्‍ण बिस्‍सा हैं। शीन काफ़ दरअसल उर्दू की वर्णमाला है जो उनके नाम के हिस्‍सों (एस.के.) को दर्शाता है। यह तो बताने वाली बात हुई, लेकिन अपनी समूची उपस्थिति में निज़ाम साहब ख़ालिस हिंदुस्‍तानी तहज़ीब और विरसे की नुमाइंदगी करते हैं।

इस्‍लामी तौर तरीकों, उनके धर्मग्रंथों, उनके मिथकों का इतना गहरा अध्‍ययन उनके पास है कि आप आसानी से उन्‍हें मौलवी या उलेमा मान सकते  हैं। लेकिन इसके लिए वे अपनी कोई अतिरिक्‍त कोशिश मानने से साफ इंकार करते हैं। उनका स्‍पष्‍ट मानना है कि यह उनके शायर होने के कारण ही है, आप यदि अरबी-फारसी-उर्दू परंपरा को समझना चाहते हैं, तो आपको उनके कल्‍चर, उनकी रवायत और उनके धार्मिक विश्‍वासों का जानकार तो होना ही पड़ेगा। वे बड़े और मुकम्‍मल शायर हैं इसीलिये अपने समूचे व्‍यक्तित्‍व में वो समूची परम्‍परा के साथ ही उपस्थित होते हैं। 

जहाँ कल था वहीं फिर आ गया हूँ 
मगर सदियों तलक चलता रहा हूँ। 

नहीं पहचानने का ये सबब है 
तेरी आँखों से खुद को देखता हूँ। 


निजा़म एक बेचैन रूह के शायर हैं। अपने आस-पास घट रही घटनाओं से बेचैन और परेशान। लेकिन शायर की प्रतिक्रिया भी अलग होती है। फिर निज़ाम साहब का भी अपना अलग अंदाजे बयाँ है। 
 
‘शुक्रिया यूँ अदा करता है, गिला हो जैसे 
उसका अंदाजे बयाँ सबसे जुदा हो जैसे’ 

यूँ हरेक शख़्स को हसरत से तका करता हूँ 
मेरी पहचान का कोई न रहा हो जैसे। 


मशहूर शायर कुमार पाशी निज़ाम साहब की शायरी के बारे में फरमाते हैं, निज़ाम एक दर्द आशना दिल रखते हैं। उनके शेर पढ़ते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि उनके सामने उदास मंज़र फैले हुए हैं, जिनकी झलक को वे लफ़्ज़ों में पेश करते हैं, 

सरनगू है साअतों के सिलसिले सहमे हुए।
दूरियां ही दूरियां हैं फासले ही फासले। 
मौसमों का बोझ तन्‍हा सह सकेगा या नहीं 
पेड़ पर जितने भी थे पत्ते पुराने झड़ गये।


या फिर, 

कहीं से बोलता कोई नहीं है 
तो बस्‍ती में भी क्‍या कोई नहीं है  
सभी के दम घुटे जाते हैं लेकिन 
खिड़कियां खोलता कोई नहीं है। 


लेकिन इसके साथ-साथ निज़ाम उम्‍मीद और हौसलों के भी शायर हैं। वह उदास ज़रूर हैं, दर्दमंद भी हैं लेकिन पस्त नहीं हैं। उनका हौसला जैसे बार-बार उन्‍हें ललकारता है, 
  
पत्तियाँ हो गई हरी देखो 
खुद से बाहर भी तो कभी देखो 
सुबह की फ़िक्र बाद में करना 
रात कितनी गुजर गई देखो, 
बाग में बस गया है डर लिखना
ऐसी बातें न भूलकर लिखना  
पैर को पैर, सर को सर लिखना 
इसमें क्‍या है कि सोचकर लिखना 
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