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ramadhari singh dinkar: not writer and poet but its just my love

मैं इनका मुरीद

तो इसलिए मुझे पसंद हैं रामधारी सिंह 'दिनकर' 

शरद मिश्र/ अमर उजाला नई दिल्‍ली

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ओजस्वी भाव के यशस्वी कवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने देश के इतिहास और महापुरुषों पर गहन नजर डाली है। अपनी रचनाओं के माध्यम से इतिहास के अनछुए पहलुओं को उसके सच के साथ उजागर करने तथा विभिषकाओं से जूझते जीवन के महान लोगों का बारीकी के साथ विश्लेषण करने में दिनकर का कोई सानी नहीं है। अपने लेखों और कविताओं में राष्ट्र को एकीकृत करने की दिनकर ने एक बेहद सफल कोशिश की है। अपनी रचनाओं में उन्होंने मानव समाज के सच को विभिन्न रूपकों के साथ बेहतरीन ढंग से रखा है। इसी वजह से मैं दिनकर जी का मुरीद हूं। 

दिनकर जी का जन्म 23 सितंबर 1908 ई. में सिमरिया, मुंगेर (बिहार) में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ, जबकि देहांत 24 अप्रैल 1974 को हुआ। 

गद्य और पद्य पर समान पकड़ रखने वाले दिनकर की भाषा जीवंत है तथा साहित्य प्रेमियों के मन में आशा और उत्साह का संचार करती है। दिनकर की 'संस्कृति के चार अध्याय' नामक पुस्‍तक में अपने देश भारत के उदय, संस्कृति तथा संस्कार के बारे में गहन समीक्षा की गई है। दिनकर के प्रथम तीन काव्य-संग्रह  'रेणुका', 'हुंकार'  और 'रसवन्ती'  में व्यक्तिपरक और सौन्दर्य की जिज्ञासा के साथ सामाजिक चेतना का बड़ी संजीदगी से उदाहरण पेश किया गया है। 

दिनकर की 'कुरुक्षेत्र' और 'रश्मिरथी' तो मुझे अत्यंत प्रिय हैं। इनकी रचना उर्वशी में सौंदर्य और उसके संयोजन को बहुत ही बेहतर ढंग से पिरोया गया है। 'कुरुक्षेत्र' में महाभारत के शान्ति पर्व के मूल कथानक को आश्रय मानकर दिनकर ने युद्ध और शान्ति के विशद, गम्भीर और महत्त्वपूर्ण विषय पर अपने विचार भीष्म और युधिष्ठर के संलाप के रूप में प्रस्तुत किये हैं। 

महाभारत की तात्कालिक परिस्थितियों और उसके विराट चरित्रों को यथार्थता की कसौटी पर कसते हुए दिनकर ने जीवन के बदलते चक्र की जो व्याख्या की है, ऐसा अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। 
'रश्मिरथी' में उन्होंने अभागे किंतु शक्तिशाली कर्ण के जीवन के झंझावातों को क्रमवार पेश कर मानस के मन म‌स्तिष्क को झकझोर कर रख दिया है। यह दिनकर का सर्वाधिक लोकप्रिय लोककाव्य कहा जा सकता है। इसकी पंक्तियां मेरे जीवन में एक तरह से प्रेरणा पुंज हैं। निराशा के दौर में मुझमें असीम उत्साह का संचार करती हैं।

रश्मिरथी की पंक्तियां एक लय में ऊर्जा और उत्साह की प्रेरक हैं। कर्ण की जीवन परिस्थितियों को पूरी वजहों से स्पष्ट करने वाले इस काव्य में जीवन का सच एक तरह से धारा बन कर अविरल प्रवाहित होते रहता है। संघर्ष से जूझ रहे एक व्य‌क्ति को यह आशा के समुंदर में डुबो देती है। इसमें महाभारत में पांडवों के तप-त्याग और संघर्ष का भी वर्णन किया गया है। 

किताब में वर्णन कुछ इस तरह से किया गया है...

कौरवों ने जुए के छल से पाण्डवों को 13 वर्षों तक वनवास झेलने को विवश कर दिया, तब का वर्णन है। 

वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
              
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

हो गया पूर्ण अज्ञात वास,
पाडंव लौटे वन से सहास,
पावक में कनक-सदृश तप कर,
वीरत्व लिए कुछ और प्रखर,
 नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,
 कुछ और नया उत्साह लिये।

मानव जब जोर लगाता है 
पत्‍थर पानी बन जाता है
गुण बड़े एक से प्रखर प्रखर 
है छिपे मानवों के भीतर 

बत्ती जो नहीं जलाता है 
रोशनी नहीं वह पाता है 

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