आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Main Inka Mureed ›   Dharamvir Bharati a renowned poet and playwright of the Hindi literature
Dharamvir Bharati a renowned poet and playwright of the Hindi literature

मैं इनका मुरीद

धर्मवीर भारती : इन फिरोजी होंठों पर बर्बाद मेरी ज़िंदगी

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

1321 Views
धर्मवीर भारती छठे दशक के हिंदी साहित्य के बहुचर्चित रचनाकार हैं। हालांकि उनकी चर्चा कविता की तुलना में गद्य लेखन के लिए ज़्यादा हुई। एक समय था जब 'गुनाहों के देवता' हर युवा की ज़रूरत बन गई थी, आज भी जो साहित्य में रूचि लेते हैं, वे अपने हमउम्र साथियों के बीच बतकही के दौरान इस उपन्यास की चर्चा ज़रूर करते हैं। इसके अलावा धर्मवीर भारती की कहानियों का संकलन 'बंद गली का आख़िरी मकान' की भी पर्याप्त चर्चा हुई। लेकिन कविता भी एक ऐसी विधा है जिसके रास्ते विचार और भाव प्रवाहित होते हैं। भारती सिर्फ कथा-उपन्यास या गद्य लेखन के महारथी नहीं थे, वे एक कवि के रूप में भी जब अपने पाठकों के सामने आते हैं तब उनके काव्य व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। 'महाभारत' के अंतिम चार दिनों के युद्ध पर आधारित धर्मवीर भारती का काव्य नाटक 'अन्धा युग' का मंचन बीते कई दशकों से जगह-जगह पर होता रहा है। भारती के काव्य में विविधता है, उनके काव्य में एक नहीं कई स्वर के सामने आते हैं। अगर आपको युद्ध और उसके बाद उपजे हालात और मनुष्य की महत्वाकांक्षा पर आधारित काव्य नाटक 'अंधा युग' पढ़ने को मिलेगा तो श्रृंगार और भोग की कवितायेँ भी मिलेंगी। उन्होंने अपने काव्य में भी लगभग सभी विषयों को छुआ है, इसीलिए वे हर पाठक की ज़रूरत हैं। सदियों तक अपनी रचनाओं की बदौलत साहित्य जगत में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में मौजूद रहेंगे। प्रेम और श्रृंगार पर उनकी कविताओं में इतनी स्पष्टता है कि हमारे जैसे पाठकों के लिए सोचना भी बड़ा मुश्किल है, प्रणय की अनंत गहराइयों में डूबे कवि की सहजकल्पना और आत्मस्वीकार की एक बानगी देखिए, अपनी कविता 'गुनाह का गीत' में वे लिखते हैं - 

अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो? 

तुम्हारा मन अगर सींचूँ 
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचल
उसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटल
किसी के होंठ पर झुक जायँ कच्चे नैन के बादल
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

किसी की गोद में सिर धर
घटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाए
धड़कते वक्ष पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?
न हो यह वासना तो ज़िन्दगी की माप कैसे हो?
किसी के रूप का सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?
नसों का रेशमी तूफान मुझ पर शाप कैसे हो?
किसी की साँस मैं चुन दूँ 

किसी के होठ पर बुन दूँ अगर अंगूर की पर्तें
प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें
यहाँ तो हर कदम पर स्वर्ग की पगडण्डियाँ घूमीं
अगर मैंने किसी की मदभरी अँगड़ाइयाँ चूमीं 
अगर मैंने किसी की साँस की पुरवाइयाँ चूमीं 
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?  


कविता में अपने चरम पर पहुंचकर वासना में बदल जाता है लेकिन वहाँ कोई अपराध का भाव नहीं है। इसी तरह वे कविता 'फिरोजी होंठ' में लिखते हैं - 

मुझे तो वासना का विष 
हमेशा ही लगा अमृत
बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद
इन फिरोजी होंठों पर बरबाद मेरी ज़िंदगी।
आगे पढ़ें

सपनों की आदी ये पलकें 

Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!