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Remembering important signature of Urdu poetry Jaun Elia  ghazal

मैं इनका मुरीद

पुरकशिश से सराबोर शख्सियत यानि जॉन एलिया

शशांक शुक्ला 'बाज', नई दिल्ली

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दश्त में ये ख़बर है गर्म मियाँ
लोग दरिया से आए हैं जल के


बेजोड़ फ़लसफ़ा, असीम अम्बर सी फ़िक्र, ख़ुशनुमा, पुरकशिश से सराबोर शख्शियत का नाम है जॉन एलिया। अमरोहा से शायरी के सफ़र की शुरुवात, जिसे इन्होंने कराची में ज़ारी रखा और दुबई में पहली बार इन्होंने अपना मजमुआ देखा। उर्दू अदब का एक ऐसा शायर जिसके जैसे लिखने वाले उस वक़्त भी नहीं थे और आज भी नहीं हैं।

"कितनी दिलकश हो तुम कितना दिलजूं हूँ मैं
क्या सितम है की हमलोग मर जाएँगे।"


इस सितम को बहुत करीब से जानते थे जॉन एलिया, और यही चीज़ की बात को चरम सीमा तक ले जाकर कहना ये उनका हुनर था। ये बात हमें 'शायद' में उनके लिखे हुए दीबाचे में देखने को मिलती है, जो उर्दू अदब की नसर का मेयार है।

कभी तल्ख़ी भरा लहजा कभी झुनझुलाहत, कभी दर्द, कभी चुभन कभी महबूबा को बेपनाह मुहब्बत, इज्ज़त दे जाना तो कभी उस पे तंज़, ऐसे हजार रंग देखने को मिलते हैं जॉन एलिया की शायरी में।
 
"एक शख्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र
काश  उस  जबाँ  दराज़  का  मूँह  नोच  ले  कोई"


दूसरी तरफ इन्होंने ये भी कहा- 

"चाँद ने तान ली है चादरें अब्र
अब वो कपड़े बदल रही होगी"


वो झुनझुलाहत जो हम सब में होती है, ऐसी बेचैनी कि हम किसी दीवार को धक्का दें और वो खिसक जाए या हम उसके आर पार हो जाएँ, मगर नहीं हो सकता। ये जॉन साहब ने बखूबी अपनी शायरी में दिखाई।

"ये  मुझे  चैन  क्यूँ  नहीं  पड़ता
एक ही शख्स था जहान में क्या"


एक ऐसी हवा जो कभी भी अपना रुख़ बदल दे, ऐसे जॉन एलिया को ख़ुद से भी ज़्यादा अजीज़ थी शायरी। दर्द की हर इंतेहा पार कर देना और उसे शायरी में ढालना और उसे सबकी ज़िन्दगी का हिस्सा बना देना, ये वो चीज़ है जिसकी वजह से जॉन एलिया को एक ऐसा मुकाम मिला जो सबको नसीब नहीं होता। एक हद तक असल जॉन को उनकी नज़्मों में देखा जा सकता है। उनकी जो पाँच किताबें आईं उनको अगर समेटा जाए तो ये कहा जा सकता है कि-

'शायद'
'यानी'
'लेकिन'
'गुमान'
और तुम 'गोया'
पाँच जिस्म और एक जाँ हों जैसे।


उनका वो जुमला की "बाबा मैं बड़ा नहीं हो सका" समंदर पे अनगिनत गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखेर देने जैसा है। एक चीज़ जिससे हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है 'बातचीत', विचारों का जब विरोधाभास होता है तो आख़िर में एक निर्णय तक पहुँचते हैं हम। जो कि अक्सर नहीं होता, जॉन का ये शेर यही एक अल्मिया दिखाता है 

"एक ही हादसा तो है और वो यह की आज तक
बात  नहीं  कही  गयी  बात  नहीं  सुनी  गयी"


बेबाक बेतक्कलुफ़ जॉन की याद में अगर आख़िर में कुछ कहना हो तो पीरज़ादा क़ासिम साहब के इस शेर से बेहतर कुछ नहीं शायद

"उसके ख़याल की नुमूद अहद-ब-अहद जावेदाँ
बस ये कहो की जॉन है ये न कहो की मर गया"।


- शशांक शुक्ला 'बाज'
 
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